रहा हूँ दुश्मनों में ख़ुश हमेशा….

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मुझे अपनों में उलझन ही रही हैरहा हूँ दुश्मनों में ख़ुश हमेशा, है इनकी इस अदा पे जान

फ़ासले क़ुर्ब की पहचान हुआ करते है…

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फ़ासले क़ुर्ब की पहचान हुआ करते हैबेसबब लोग परेशान हुआ करते है, ये हकीक़त है जहाँ टूट के

नींद ना आये फूलो पे, काँटो पे सोना पड़ता है…

नींद ना आये फूलो

यहाँ पल पल चलना पड़ता हैहर रंग में ढलना पड़ता है, हर मोड़ पे ठोकर लगती हैहर हाल

सर रख कर रोने को शाना चाहिए था…

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सर रख कर रोने को शाना चाहिए थामैं तन्हा था तुझको आना चाहिए था, आज मैं आया था

जिस शेर का उन्वान मुहब्बत थी, वो तुम थे…

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जिस शेर का उन्वान मुहब्बत थी, वो तुम थेजिस दर्द का दरमान मुहब्बत थी, वो तुम थे, रंगीन

चाहा है तुझे मैंने तेरी ज़ात से हट कर…

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चाहा है तुझे मैंने तेरी ज़ात से हट करइस बार खड़ा हूँ मैं रवायात से हट कर, तुम

तुझे ना आयेगी मुफ़लिस की मुश्किलात समझ..

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तुझे ना आयेगी मुफ़लिस की मुश्किलात समझमैं छोटे लोगो के घर का बड़ा हूँ, बात समझ, मेरे अलावा

राह से हिज़्र की दीवार हटाने के लिए

raah se hizr ki

राह से हिज़्र की दीवार हटाने के लिएहाथ भी जोड़े उसको मनाने के लिए, अपनी खातिर तो कभी

फिर यूँ हुआ कि रास्ते यकज़ा नहीं रहे…

फिर यूँ हुआ कि

फिर यूँ हुआ कि रास्ते यकज़ा नहीं रहेवो भी अना परस्त था मैं भी अना परस्त, फिर यूँ

रात भी, नींद भी, कहानी भी

raat-bhi-neend-bhi

रात भी, नींद भी, कहानी भीहाय, क्या चीज़ है जवानी भी एक पैग़ाम-ए-ज़िन्दगानी भीआशिक़ी मर्गे-नागहानी भी इस अदा