बिछड़ते दामनों में फूल की कुछ पत्तियाँ रख दो

bichhadte daamnon me phool kee kuch pattiyan

बिछड़ते दामनों में फूल की कुछ पत्तियाँ रख दो तअल्लुक़ की गिराँबारी में थोड़ी नर्मियाँ रख दो, भटक

ग़ुरूब ए शाम ही से ख़ुद को यूँ महसूस करता हूँ

gurub e shaam hi se khud ko yun mahsus

ग़ुरूब ए शाम ही से ख़ुद को यूँ महसूस करता हूँ कि जैसे एक दिया हूँ और हवा

अपने घर के दर ओ दीवार को ऊँचा न करो

apne ghar ke dar o deewar ko ooncha na

अपने घर के दर ओ दीवार को ऊँचा न करो इतना गहरा मेरी आवाज़ से पर्दा न करो,

दयार ए दिल की रात में चराग़ सा जला गया

dayaar e dil kee raat me charag saa jala gaya

दयार ए दिल की रात में चराग़ सा जला गया मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक्ल तो

गए दिनों का सुराग़ ले कर किधर से आया किधर गया वो

gaye dino ka suraag le kar kidhar se aaya kidhar gaya wo

गए दिनों का सुराग़ ले कर किधर से आया किधर गया वो अजीब मानूस अजनबी था मुझे तो

वो साहिलों पे गाने वाले क्या हुए

wo saahilon pe gaane wale kya hue

वो साहिलों पे गाने वाले क्या हुए वो कश्तियाँ चलाने वाले क्या हुए ? वो सुब्ह आते आते

तेरे आने का धोका सा रहा है

tere aane ka dhoka saa raha hai

तेरे आने का धोका सा रहा है दिया सा रात भर जलता रहा है, अजब है रात से

होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी

hoti hai tere naam se wahshat kabhi kabhi

होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी बरहम हुई है यूँ भी तबी’अत कभी कभी, ऐ दिल

कुछ इस अदा से ग़म ए ज़िंदगी के साथ चले

kuch is ada se gam e zindagi ke saath chale

कुछ इस अदा से ग़म ए ज़िंदगी के साथ चले कि जैसे कोई किसी अजनबी के साथ चले,

नए कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ

naye kapde badal kar jaaoon kahan

नए कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किस के लिए ? वो शख़्स तो शहर ही