मज़लूमों के हक़ मे अब आवाज़…

mazlumo ke haq me ab awaz

मज़लूमों के हक़ मे अब आवाज़ उठाये कौन ? जल रही बस्तियाँ,आह ओ सोग मनाये कौन ? कौन

ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं

thik hai khud ko ham badalte hai

ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं शुक्रिया मश्वरत का चलते हैं, हो रहा हूँ मैं किस तरह

ज़ुल्म की हद ए इंतेहा को मिटाने का वक़्त है

zulm ki had e inteha

ज़ुल्म की हद ए इंतेहा को मिटाने का वक़्त है अब मज़लूमों का साथ निभाने का वक़्त है,

कभी झूठे सहारे ग़म में रास आया…

kabhi jhuthe sahare gam me raas aaya nahi kar..

कभी झूठे सहारे ग़म में रास आया नहीं करते ये बादल उड़ के आते हैं मगर साया नहीं

पैगम्बरों की राह पर चल कर न देखना

paigambaron ki raah par chal kar na dekhna

पैगम्बरों की राह पर चल कर न देखना या फिर चलो तो राह के पत्थर न देखना, पढ़ते

एक पल के लिए एक घड़ी के लिए

ek pal ke liye ek ghadi ke liye

एक पल के लिए एक घड़ी के लिए वक़्त रुकता ही नहीं किसी के लिए, रात कितनी भी

गमों का लुत्फ़ उठाया है खुशी…

gamon ka lutf uthaya hai khushi ka jaam baandha hai

गमों का लुत्फ़ उठाया है खुशी का जाम बाँधा है तलाश ए दर्द से मंज़िल का हर एक

आँख से टूट कर गिरी थी नींद

aankh se tut kar giri thi neend

आँख से टूट कर गिरी थी नींद वो जो मदहोश हो चुकी थी नींद, मेरी आँखों के क्यूँ

नक़ाब चेहरों पे सजाये हुए आ जाते है

naqaab chehron pe sajaaye hue

नक़ाब चेहरों पे सजाये हुए आ जाते है अपनी करतूत छुपाये हुए आ जाते है, घर निकले कोई

कहीं पे सूखा कहीं चारों सिम्त पानी है

kahin pe sukha kahin pe charo simt paani

कहीं पे सूखा कहीं चारों सिम्त पानी है गरीब लोगों पे क़ुदरत की मेहरबानी है, हर एक शख्स