नसीबो पर नहीं चलते नजीरों पर नहीं चलते…

नसीबो पर नहीं चलते

नसीबो पर नहीं चलते, नजीरों पर नहीं चलते जो सचमुच में बड़े है वो लकीरों पर नहीं चलते,

फ़लसफ़े इश्क़ में पेश आये सवालो की तरह…

falsafe ishq me pesh aaye sawalo ki tarah

फ़लसफ़े इश्क़ में पेश आये सवालो की तरह हम परेशाँ ही रहे अपने ख्यालो की तरह, शीशागर बैठे

हकीक़त में नहीं कुछ भी दिखा है…

haqiqat me nahi kuch bhi dikha hai

हकीक़त में नहीं कुछ भी दिखा है क़िताबो में मगर सब कुछ लिखा है, मुझे समझा के वो

बसा बसाया शहर अब बंजर लग रहा है…

basa basaya shahar ab banzar lag raha hai

बसा बसाया शहर अब बंजर लग रहा है चारो ओर उदासियो का मंज़र लग रहा है, जाने अंजाने

रोज़ जब रात को बारह का गजर होता है…

roj raat ko jab barah ka gajar hota hai

रोज़ जब रात को बारह का गजर होता है यातनाओं के अँधेरे में सफ़र होता है, कोई रहने

आँसू हो, उदासी हो और ख़ामोश चीत्कार हो…

aansoo ho udasi ho khamosh chitkar ho

आँसू हो, उदासी हो और ख़ामोश चीत्कार हो गज़ल कहनी हो तो पहले किसी से प्यार हो, कलम

हालात थे ख़राब या मैं ख़राब था…

halaat the kharab yaa main kharab tha

हालात थे ख़राब या मैं ख़राब था मेरे सवाल में शामिल जवाब था, ख़ुशी मेरी क़िस्मत ने छिनी

कभी लोग बदले कभी ठिकाना बदला…

saaqi na mil saka fir bhi use

कभी लोग बदले कभी ठिकाना बदला कभी सनम कभी सनम खाना बदला, साक़ी न मिल सका फिर भी

ऐ दिल ये तेरी ज़िद्द मुझे नादानी लगती है…

ae dil ye teri zidd mujhe nadaani lagti hai

ऐ दिल ये तेरी ज़िद्द मुझे नादानी लगती है उसे पाने की उम्मीद अब बेमानी लगती है, क्यों

बदन पे जिसके शराफ़त का पैरहन देखा…

badan pe jiske sharafat ka pairahan dekha

बदन पे जिसके शराफ़त का पैरहन देखा वो आदमी भी यहाँ हमने बदचलन देखा, ख़रीदने को जिसे कम