जिस्म का बोझ उठाए हुए चलते रहिए…

zindagi ka bojh uthaye hue chalte rahiye

जिस्म का बोझ उठाए हुए चलते रहिए धूप में बर्फ़ की मानिंद पिघलते रहिए, ये तबस्सुम तो है

दुनियाँ कहीं जो बनती है मिटती ज़रूर है…

duniyan kahin jo banti hai mitati zarur hai

दुनियाँ कहीं जो बनती है मिटती ज़रूर है परदे के पीछे कोई न कोई ज़रूर है, जाते है

तू ग़ज़ल बन के उतर बात मुकम्मल हो जाए…

tu gazal ban ke utar baat muqammal ho jaaye

तू ग़ज़ल बन के उतर बात मुकम्मल हो जाए मुंतज़िर दिल की मुनाजात मुकम्मल हो जाए, उम्र भर

हाल ए दिल पे ही शायर बुनते है गज़ल…

haal e dil pe hi shayar bunte hai gazal

हाल ए दिल पे ही शायर बुनते है गज़ल जो बात दिल की समझते है वो सुनते है

दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह…

kis simt chal padi hai khudai mere khuda

दर्द से मेरा दामन भर दे या अल्लाह फिर चाहे दीवाना कर दे या अल्लाह, मैनें तुझसे चाँद

बिखरे बिखरे सहमे सहमे रोज़ ओ शब देखेगा कौन…

bikhre bikhre sahme sahme roz o shab

बिखरे बिखरे सहमे सहमे रोज़ ओ शब देखेगा कौन लोग तेरे जुर्म देखेंगे सबब देखेगा कौन ? हाथ

ये विसाल ओ हिज़्र का मसअला तो…

ye visal o hizr ka mas'ala to meri samjh me naa

ये विसाल ओ हिज़्र का मसअला तो मेरी समझ में न आ सका कभी कोई मुझको न पा

हम ग़ज़ल में तेरा चर्चा नहीं होने देते…

gazal me tera charcha nahi hone dete

हम ग़ज़ल में तेरा चर्चा नहीं होने देते तेरी यादों को भी रुस्वा नहीं होने देते, कुछ तो

मेरे थके हुए शानों से बोझ उतर तो गया…

mere thake hue shano se bojh utar to gaya

मेरे थके हुए शानों से बोझ उतर तो गया बहुत तवील था ये दिन मगर गुज़र तो गया,

थकी हुई मामता की क़ीमत लगा रहे हैं…

thaki hui mamta ki qeemat laga rahe hai

थकी हुई मामता की क़ीमत लगा रहे हैं अमीर बेटे दुआ की क़ीमत लगा रहे हैं, मैं जिन