हँसी में हक़ जता कर घर जमाई छीन लेता है
मेरे हिस्से की टूटी चारपाई छीन लेता है,
उसे मौक़ा मिले तो पाई पाई छीन लेता है
यहाँ भाई की ख़ुशियाँ उस का भाई छीन लेता है,
भला फ़ुर्सत किसे है जो यहाँ रिश्तों को पहचाने
ये दौर ए ख़ुद फ़रेबी आश्नाई छीन लेता है,
जहालत में वो कामिल है मोअल्लिम बन गया कैसे
पढ़ाता है कि बच्चों की पढ़ाई छीन लेता है ?
रवा है उस को हर सरक़ा तवारुद के बहाने से
कभी नज़्में कभी ग़ज़लें पराई छीन लेता है,
कोई क़ाबू नहीं चलता कि उस के हुस्न का डाकू
किसी भी पारसा की पारसाई छीन लेता है,
मेंरा महबूब नटवरलाल है क्या जो मेंरे दिल को
दिखा कर अपने हाथों की सफ़ाई छीन लेता है,
बड़ा चालाक है शागिर्द से उस्ताद हैराँ हैं
ग़ज़ल कहते ही वो बन कर क़साई छीन लेता है,
निकलने ही नहीं देता किसी को अपने फंदे से
दिमाग़ ओ दिल से तदबीर ए रिहाई छीन लेता है,
ज़फ़र तुम वक़्त से डरते रहो इस पर नज़र रखो
ये दिलबर से भी उस की दिलरुबाई छीन लेता है..!!
~ज़फ़र कमाली
Discover more from Hindi Gazals :: हिंदी ग़ज़लें - A Huge collection of Hindi/Urdu Ghazals :: हिंदी/उर्दू ग़ज़लों का विशाल संग्रह
Subscribe to get the latest posts sent to your email.

























