आँख से फिर न बहेगा दिल ए बर्बाद का दुःख
जब परीजाद समझ लेगी अनाज़ाद का दुःख
याद करता हूँ तो तार ए रग ए जान टूटती है
मार डालेगा किसी रोज़ तेरी याद का दुःख
तख़्त ए परवेज़ से वाबस्ता था सुख शिरीन का
कैसे कर सकती थी महसूस वो फ़रहाद का दुःख ?
नस्ल दर नस्ल दुखो को किया तकसीम मगर
खत्म होने को नहीं आता है अज़दाद का दुःख..!!
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