सभी कहें मेरे ग़मख़्वार के अलावा भी
कोई तो बात करूँ यार के अलावा भी,
बहुत से ऐसे सितमगर थे अब जो याद नहीं
किसी हबीब ए दिलआज़ार के अलावा भी,
ये क्या कि तुम भी सर ए राह हाल पूछते हो
कभी मिलो हमें बाज़ार के अलावा भी,
उजाड़ घर में ये ख़ुशबू कहाँ से आई है
कोई तो है दर ओ दीवार के अलावा भी,
सो देख कर तेरे रुख़्सार ओ लब यक़ीं आया
कि फूल खिलते हैं गुलज़ार के अलावा भी,
कभी फ़राज़ से आ कर मिलो जो वक़्त मिले
ये शख़्स ख़ूब है अशआर के अलावा भी..!!
~अहमद फराज़
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