दुनियाँ ए अक़ीदत में अजब रस्म चली है
जो दश्त में मजनूँ था वो मरकज़ मे वली है,
तहज़ीब ए गुलिस्ताँ का अजब रंग है यारों
वो फूल है बातिन में जो ज़ाहिर में कली है,
क्या तुझको पता अपनी रिहाइश का बताऊँ
उस शहर में हूँ जिस मे मुहल्ला न गली है,
वो दिन जो हम गरीबों का भरम तोड़ने आए
उस दिन से तो ऐ मेरे ख़ुदा ये रात भली है…!!
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