मसरूफ़ियत उसी की है फ़ुर्सत उसी की है
इस सरज़मीन ए दिल पे हुकूमत उसी की है,
मिलता है वो भी तर्क ए तअल्लुक़ के बावजूद
मैं क्या करूँ कि मुझको भी आदत उसी की है,
जो उम्र उस के साथ गुज़ारी उसी की थी
बाक़ी जो बच गई है मसाफ़त उसी की है,
होता है हर किसी पे उसी का गुमाँ मुझे
लगता है हर किसी में शबाहत उसी की है,
लिखूँ तो उसके इश्क़ को लिखना है शायरी
सोचूँ तो ये सुख़न भी इनायत उसी की है,
दर ए आस्ताँ कोई हो ब ज़ाहिर सर ए सुजूद
लेकिन पस ए सुजूद इबादत उसी की है,
वो जिस के हक़ में झूटी गवाही भी मैं ने दी
‘रूही’ मेरे ख़िलाफ़ शहादत उसी की है..!!
~रेहाना रूही
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