जिस सर को ग़ुरूर आज है याँ ताजवरी…

जिस सर को ग़ुरूर आज है याँ ताजवरी का
कल उस पे यहीं शोर है फिर नौहागरी का,

शर्मिंदा तेरे रुख़ से है रुख़्सार परी का
चलता नहीं कुछ आगे तेरे कब्क ए दरी का,

आफ़ाक़ की मंज़िल से गया कौन सलामत
अस्बाब लुटा राह में याँ हर सफ़री का,

ज़िंदाँ में भी शोरिश न गई अपने जुनूँ की
अब संग मुदावा है इस आशुफ़्ता सरी का,

हर ज़ख़्म ए जिगर दावर ए महशर से हमारा
इंसाफ़ तलब है तेरी बेदाद गरी का,

अपनी तो जहाँ आँख लड़ी फिर वहीं देखो
आईने को लपका है परेशाँ नज़री का,

सद मौसम ए गुल हम को तह ए बाल ही गुज़रे
मक़्दूर न देखा कभू बे बाल ओ परी का,

इस रंग से झमके है पलक पर कि कहे तू
टुकड़ा है मेरा अश्क अक़ीक़ ए जिगरी का,

कल सैर किया हम ने समुंदर को भी जा कर
था दस्त ए निगर पंजा ए मिज़्गाँ की तरी का,

ले साँस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम
आफ़ाक़ की इस कारगह ए शीशागरी का,

टुक मीर ए जिगर सोख़्ता की जल्द ख़बर ले
क्या यार भरोसा है चराग़ ए सहरी का..!!

~मीर तक़ी मीर


Discover more from Hindi Gazals :: हिंदी ग़ज़लें - A Huge collection of Hindi/Urdu Ghazals :: हिंदी/उर्दू ग़ज़लों का विशाल संग्रह

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply