अज़ाब ए हिज़्र बढ़ा लूँ अगर इजाज़त हो

अज़ाब ए हिज़्र बढ़ा लूँ अगर इजाज़त हो
एक और ज़ख्म खा लूँ अगर इजाज़त हो,

तुम्हारे आरिज़ ओ लब की जुदाई के दिन है
मैं जाम मुँह से लगा लूँ अगर इजाज़त हो,

तुम्हारा हुस्न तुम्हारे ख्याल का चेहरा
शबाहतों में छुपा लूँ अगर इजाज़त हो,

तुम्ही से है मेरे हर ख़्वाब ए शौक़ का रिश्ता
एक और ख़्वाब कमा लूँ अगर इजाज़त हो,

थका दिया है तुम्हारे फ़िराक ने मुझको
कहीं मैं ख़ुद को गिरा लूँ अगर इजाज़त हो,

बराए नाम बनाम ए शब ए विसाल यहाँ
शब ए फ़िराक मना लूँ अगर इजाज़त हो..!!

~जौन एलिया


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