पूछो अगर तो करते है इन्कार सब के सब

पूछो अगर तो करते है इन्कार सब के सब
सच ये कि है हयात से बेज़ार सब के सब,

अपनी ख़बर किसी को नहीं फिर भी जाने क्यूँ ?
पढ़ते है रोज़ शहर में अख़बार सब के सब,

था एक मैं जो शर्त ए वफ़ा तोड़ता रहा
हालांकि बा वफ़ा थे मेरे यार सब के सब,

सोचो तो नफरतों का ज़खीरा है एक दिल
करते है यूँ तो प्यार का इज़हार सब के सब,

ज़िंदान कोई क़रीब नहीं और न रक्स गाह
सुनते है एक अज़ीब सी झंकार सब के सब,

मैदान ए जंग आने से पहले पलट गए
निकले थे ले के हाथ में तलवार सब के सब,

ज़हनो में खौलना था जो लावा वो जम गया
मफलूज़ हो के रह गए फ़नकार सब के सब..!!


Discover more from Hindi Gazals :: हिंदी ग़ज़लें - A Huge collection of Hindi/Urdu Ghazals :: हिंदी/उर्दू ग़ज़लों का विशाल संग्रह

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply