एक तो ज़ालिम उसपे क़हर आँखे दिखा रहा है
अंज़ाम ए बेहया शायद अब नज़दीक आ रहा है,
गुजिस्तां कुछ वक़्त से पापी आकाइयों का
सब जानते हो तुम यारो क़िरदार क्या रहा है,
धरती है एक ढाँचा, कर्गस है चार ज़ानिब
एक मरकज़ में है नोचे,एक सूबे को खा रहा है,
हकीम की बे ज़ियाफ़त चौतीस लाख की
और इस शहर का मुअल्लिम टुकड़े चबा रहा है,
क्या तजरुबे को तुझको ये सरज़मी मिली थी ?
चुल्लू में डूब मर तू, क्यों सीने दिखा रहा है ?
चाले है शातिराना, नीयत भी खोट वाली
वाहिद हुक्मराँ है जिससे सबको गिला रहा है,
ज़ाती अदावतें है और मुल्क को लगाया दाँव पर
जागो वतनपरस्तो मुल्क अपने हाथो से जा रहा है,
बच्चो का फ़ैसला भी पुख्ता हो उससे शायद पर
कच्चा इस नामुराद का हमेशा से फ़ैसला रहा है..!!
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