कुछ यादगार ए शहर ए सितमगर ही ले चलें

कुछ यादगार ए शहर ए सितमगर ही ले चलें
आए हैं इस गली में तो पत्थर ही ले चलें,

यूँ किस तरह कटेगा कड़ी धूप का सफ़र
सर पर ख़याल ए यार की चादर ही ले चलें,

रंज ए सफ़र की कोई निशानी तो पास हो
थोड़ी सी ख़ाक ए कूचा ए दिलबर ही ले चलें,

ये कह के छेड़ती है हमें दिल गिरफ़्तगी
घबरा गए हैं आप तो बाहर ही ले चलें,

इस शहर ए बे चराग़ में जाएगी तू कहाँ
आ ऐ शब ए फ़िराक़ तुझे घर ही ले चलें..!!

~नासिर काज़मी

क्या ज़माना था कि हम रोज़ मिला करते थे

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1 thought on “कुछ यादगार ए शहर ए सितमगर ही ले चलें”

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