जश्न ए ग़म हा ए दिल मनाता हूँ
चोट खाता हूँ मुस्कुराता हूँ,
हादसों से गुज़रता जाता हूँ
जज़्बा ए दिल को आज़माता हूँ,
अश्क ए ग़म की लतीफ़ शबनम से
तेरी यादों के गुल खिलाता हूँ,
ग़म ए दौराँ की तेज़ आँधी में
दीप उम्मीद के जलाता हूँ,
सामना जब भी उन का हो शाहीन
बात कहने की भूल जाता हूँ..!!
~उस्मान शाहीन
हम बिछड़ के तुम से बादल की तरह रोते रहे
Discover more from Hindi Gazals :: हिंदी ग़ज़लें - A Huge collection of Hindi/Urdu Ghazals :: हिंदी/उर्दू ग़ज़लों का विशाल संग्रह
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


























1 thought on “जश्न ए ग़म हा ए दिल मनाता हूँ”