मेरे सिवा भी कोई गिरफ़्तार मुझ में है

मेरे सिवा भी कोई गिरफ़्तार मुझ में है
या फिर मेरा वजूद ही बेज़ार मुझ में है,

मेरी ग़ज़ल किसी के तकल्लुम की बाज़गश्त
एक यार ए ख़ुश कलाम ओ तरहदार मुझ में है,

हद है कि तू न मेरी अज़िय्यत समझ सका
शायद कोई बला का अदाकार मुझ में है,

जिस का वजूद वक़्त से पहले की बात है
वो भी अदम से बरसर ए पैकार मुझ में है,

तू है कि तेरी ज़ात का इक़रार हर नफ़स
मैं हूँ कि मेरी ज़ात का इंकार मुझ में है,

तुझ से न कुछ कहा तो किसी से न कुछ कहा
कितनी शदीद ख़्वाहिश ए इज़हार मुझ में है,

मैं क्या हूँ काएनात में कुछ भी नहीं हूँ मैं
फिर क्यूँ इसी सवाल की तकरार मुझ में है ?

जिस दिन से मैं विसाल की आसूदगी में हूँ
उस दिन से वो फ़िराक़ से दो चार मुझ में है,

मैं हूँ कि एक पल की भी फ़ुर्सत नहीं मुझे
वो है कि एक उम्र से बे कार मुझ में है..!!

~इरफ़ान सत्तार


Discover more from Hindi Gazals :: हिंदी ग़ज़लें - A Huge collection of Hindi/Urdu Ghazals :: हिंदी/उर्दू ग़ज़लों का विशाल संग्रह

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply