मीर ओ ग़ालिब बने यगाना बने
आदमी ऐ ख़ुदा ख़ुदा न बने,
मौत की दस्तरस में कब से हैं
ज़िंदगी का कोई बहाना बने,
अपना शायद यही था जुर्म ऐ दोस्त
बा वफ़ा बन के बे वफ़ा न बने,
हम पे एक एतिराज़ ये भी है
बे नवा हो के बे नवा न बने,
ये भी अपना क़ुसूर क्या कम है
किसी क़ातिल के हमनवा न बने,
क्या गिला संगदिल ज़माने का
आश्ना ही जब आश्ना न बने,
छोड़ कर उस गली को ऐ जालिब
एक हक़ीक़त से हम फ़साना बने..!!
~हबीब जालिब
शेर होता है अब महीनों में
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