आँखे बन जाती है सावन की घटा शाम के बाद

आँखे बन जाती है सावन की घटा शाम के बाद
लौट जाता है अगर कोई खफ़ा शाम के बाद,

वो जो टाल जाती रही सर से बला शाम के बाद
कोई तो था कि जो देता था दुआ शाम के बाद,

आँखे भरती है शब ए हिज़्र यतीमो की तरह
सर्द हो जाती है हर रोज़ हवा शाम के बाद,

शाम तक क़ैद रहा करते है दिल के अन्दर
दर्द हो जाते है सारे ही रिहा शाम के बाद,

लोग थक हार के सो जाते है लेकिन जानाँ
हम ने ख़ुश हो कर तेरा दर्द सहा शाम के बाद,

चाँद जब रो कर सितारों से गले मिलता है
एक अज़ब रंग की होती है फिज़ा शाम के बाद,

हमने तन्हाई से पूछा कि मिलोगी कबतक ?
उसने बेचैनी से फ़ौरन ही कहा शाम के बाद,

तुम गए हो तो सियाह रंग के कपडे पहने
फिरती रहती है मेरे घर में क़ज़ा शाम के बाद,

मार देता है उजड़ जाने का दोहरा एहसास
काश ! हो कोई किसी से ना जुदा शाम के बाद..!!


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