ग़म ए इश्क़ रह गया है ग़म ए जुस्तुजू में ढल कर
वो नज़र से छुप गए हैं मेरी ज़िंदगी बदल कर,
तेरी गुफ़्तुगू को नासेह दिल ए गम ज़दा से जल कर
अभी तक तो सुन रहा था मगर अब सँभल सँभल कर,
न मिला सुराग़ ए मंज़िल कभी उम्र भर किसी को
नज़र आ गई है मंज़िल कभी दो क़दम ही चल कर,
ग़म ए उम्र ए मुख़्तसर से अभी बेख़बर हैं कलियाँ
न चमन में फेंक देना किसी फूल को मसल कर,
हैं किसी के मुंतज़िर हम मगर ऐ उमीद ए मुबहम
कहीं वक़्त रह न जाए यूँही करवटें बदल कर,
मेरे दिल को रास आया न जुमूद ओ ग़ैर फ़ानी
मिली राह ए ज़िंदगानी मुझे ख़ार से निकल कर,
मेरी तेज़ गामियों से नहीं बर्क़ को भी निस्बत
कहीं खो न जाए दुनिया मेरे साथ साथ चल कर,
कभी यकबयक तवज्जोह कभी दफ़अतन तग़ाफ़ुल
मुझे आज़मा रहा है कोई रुख़ बदल बदल कर,
हैं शकील ज़िंदगी में ये जो वुसअतें नुमायाँ
इन्हीं वुसअतों से पैदा कोई आलम ए ग़ज़ल कर..!!
~शकील बदायूनी
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