गली में दर्द के पुर्ज़े तलाश करती थी

गली में दर्द के पुर्ज़े तलाश करती थी
मेरे ख़ुतूत के टुकड़े तलाश करती थी,

कहाँ गई वो कुँवारी उदास बी आपा
जो गाँव गाँव में रिश्ते तलाश करती थी,

भुलाए कौन अज़िय्यत पसंदियाँ उस की
ख़ुशी के ढेर में सदमे तलाश करती थी,

अजीब हिज्र परस्ती थी उस की फ़ितरत में
शजर के टूटते पत्ते तलाश करती थी,

क़याम करती थी वो मुझ में सूफ़ियों की तरह
उदास रूह के गोशे तलाश करती थी,

तमाम रात को पर्दे हटा के चाँद के साथ
जो खो गए थे वो लम्हे तलाश करती थी,

कुछ इस लिए भी मेरे घर से उस को थी वहशत
यहाँ भी अपने ही प्यारे तलाश करती थी,

घुमा फिरा के जुदाई की बात करती थी
हमेशा हिज्र के हरबे तलाश करती थी,

तमाम रात वो ज़ख़मा के अपने पोरों को
मेरे वजूद के रेज़े तलाश करती थी,

दुआएँ करती थी उजड़े हुए मज़ारों पर
बड़े अजीब सहारे तलाश करती थी,

मुझे तो आज बताया है बादलों ने वसी
वो लौट आने के रस्ते तलाश करती थी..!!

~वसी शाह


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