राजनीति की राह में तो ये करते है वादे हज़ार
निभाने की बारी जब भी आये हो जाते है बेज़ार,
झूठे सपने बेच जनता को लुटते है सर ए बाज़ार
फक़त चुनावी मौसम में बनते है रहनुमा ये यार,
विकास की बातें करते फिरते गाँव में चौपाल में
फिर ऐसे ग़ायब हो दिखे ही नहीं अगले पाँच साल में,
वोट पाते ही ये यूँ रंग बदल लेते है जैसे हो गिरगिट
शायद हम ही भूल जाते हैं यही है इनकी हक़ीक़त,
सत्ता की कुर्सी पर जब सियासतदाँ बैठाये जाते हैं
ग़रीब ओ मुफ़्लिस की थाली से निवाले चुराए जाते हैं,
यही है क़िस्सा इनका यही है इनकी सच्ची कहानी
बस चुनाव तक ही ज़िंदा है, इनका फेकना ज़ुबानी..!!
~नवाब ए हिन्द
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