कटा न कोह ए अलम हम से कोहकन की तरह
बदल सका न ज़माना तेरे चलन की तरह,
हज़ार बार किया ख़ून ए आरज़ू हमने
जबीन ए दहर पे फिर भी रहे शिकन की तरह,
सवाद ए शब की ये तन्हाइयाँ भी डसती हैं
ये चाँदनी भी नज़र आती है कफ़न की तरह,
तमाम शहर है बेगाना लोग ना मानूस
वतन में अपने हैं हम एक बे वतन की तरह,
ख़याल ए दोस्त न हसरत न आरज़ू न उम्मीद
ये दिल है अब किसी उजड़े हुए चमन की तरह,
सुकून ए क़ल्ब तो क्या है क़रार ए जाँ भी लुटा
तुम्हारी याद भी आई तो राहज़न की तरह,
अजब नहीं कि सर ए शहर ए आरज़ू नादिर
हमारा दिल भी जले शम ए अंजुमन की तरह..!!
~अतहर नादिर
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