अगर न रोये तो आँखों पे बोझ पड़ता है
करें जो गिर्या तो रातों पे बोझ पड़ता है,
परिंदे छोड़ के तन्हा अगर चले जाएँ
तो फिर दरख़्त की शाखों पे बोझ पड़ता है,
खता ए इश्क को अब सिर्फ़ सोचने भर से
हमारी रूह के छालों पे बोझ पड़ता है,
ये चाँद करता है आराम जब अमावस में
स्याह रात में तारों पे बोझ पड़ता है,
तुम उनको इल्म दो लेकिन ये एहतियात रखो
हो भारी बस्ता तो बच्चों पे बोझ पड़ता है,
सुकूत इतना हमें रास आ गया है कि अब
जो कुछ सुने भी तो कानों पे बोझ पड़ता है,
तुम्हारी याद की उजड़ी हुई हवेली में
है इतनी धूल की साँसों पे बोझ पड़ता है,
हम इस ख्याल से हिजरत भी कर नहीं सकते
क़दम बढायें तो राहों पे बोझ पड़ता है..!!
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