मेरे लबों पे उसी आदमी की प्यास न हो
जो चाहता है मेरे सामने गिलास न हो,
ये तिश्नगी तो मिली है हमें विरासत में
हमारे वास्ते दरिया कोई उदास न हो,
तमाम दिन के दुखों का हिसाब करना है
मैं चाहता हूँ कोई मेरे आस पास न हो,
मुझे भी दुख है ख़ता हो गया निशाना तेरा
कमान खींच मैं हाज़िर हूँ तू उदास न हो,
ग़ज़ल ही रह गई ताहिर फ़राज़ अपने लिए
जहाँ में कोई ऐसा भी बे असास न हो..!!
~ताहिर फ़राज़
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