कभी फूलों कभी खारों से बचना
कभी रक़ीब कभी यारों से बचना,
जान बुझ कर धोखा न खा लेना
राख़ मे दबे हुए अंगारों से बचना,
साहिल पे भी कश्ती डूब जाती है
यकीन ना कर किनारो से बचना,
मौसम तो बदलते ही रहते है यहाँ
कभी ख़िज़ाँ कभी बहारों से बचना,
बीच राह मे तन्हा छोड़ जाते है लोग
यार तुम ऐसे दिलदारों से बचना,
जो गिरगिट की तरह रंग बदले
ज़िंदगी मे ऐसे किरदारों से बचना..!!
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