ग़ुरूब ए शाम ही से ख़ुद को यूँ महसूस करता हूँ
ग़ुरूब ए शाम ही से ख़ुद को यूँ महसूस करता हूँ कि जैसे एक दिया हूँ और हवा
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ग़ुरूब ए शाम ही से ख़ुद को यूँ महसूस करता हूँ कि जैसे एक दिया हूँ और हवा
अपने घर के दर ओ दीवार को ऊँचा न करो इतना गहरा मेरी आवाज़ से पर्दा न करो,
दयार ए दिल की रात में चराग़ सा जला गया मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक्ल तो
गए दिनों का सुराग़ ले कर किधर से आया किधर गया वो अजीब मानूस अजनबी था मुझे तो
वो साहिलों पे गाने वाले क्या हुए वो कश्तियाँ चलाने वाले क्या हुए ? वो सुब्ह आते आते
तेरे आने का धोका सा रहा है दिया सा रात भर जलता रहा है, अजब है रात से
होती है तेरे नाम से वहशत कभी कभी बरहम हुई है यूँ भी तबी’अत कभी कभी, ऐ दिल
कुछ इस अदा से ग़म ए ज़िंदगी के साथ चले कि जैसे कोई किसी अजनबी के साथ चले,
नए कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किस के लिए ? वो शख़्स तो शहर ही
निय्यत ए शौक़ भर न जाए कहीं तू भी दिल से उतर न जाए कहीं, आज देखा है