कोई बचने का नहीं सब का पता जानती है
कोई बचने का नहीं सब का पता जानती है किस तरफ़ आग लगाना है हवा जानती है, उजले
Political Poetry
कोई बचने का नहीं सब का पता जानती है किस तरफ़ आग लगाना है हवा जानती है, उजले
ज़ुल्म के तल्ख़ अंधेरो के तलबगार हो तुम ये इल्म है कि नफ़रत के मददगार हो तुम, जिसके
पा सके न सुकूं जो जीते जी वो मर के कहाँ पाएँगे शहर के बेचैन परिंदे फिर लौट
मुझको अपने बैंक की क़िताब दीजिए देश की तबाही का हिसाब दीजिए, गाँव गाँव ज़ख़्मी फिजाएँ हो गई
अब दावत पे भी बारात पे भी टैक्स लगेगा अब शादी की रसुमात पे भी टैक्स लगेगा, अब
हक़ीर जानता है इफ्तिखार माँगता है वो ज़हर बाँटता है और प्यार माँगता है, ज़लील कर के रख
धरती पर जब ख़ूँ बहता है बादल रोने लगता है देख के शहरों की वीरानी जंगल रोने लगता
दो चार क्या हैं सारे ज़माने के बावजूद हम मिट नहीं सकेंगे मिटाने के बावजूद, ये राज़ काश
बड़ा बेशर्म ज़ालिम है, बड़ी बेहिस फ़ितरत है उसको कहाँ पता हया क्या ? क्या शराफ़त है, हमें
समंदरों में हमारा निशान फैला है पलट के देख मुए आसमान फैला है, मुक़ाबला है ख़ुराफ़ात का अँधेरों