वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम ए ज़र है ख़तरे में
वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम ए ज़र है ख़तरे में हक़ीक़त में जो रहज़न है वही रहबर
Patriotic Poetry
वतन को कुछ नहीं ख़तरा निज़ाम ए ज़र है ख़तरे में हक़ीक़त में जो रहज़न है वही रहबर
सुनो मादर-ए-हिन्द के नौ-निहालो सदाक़त पे गर्दन कटा लेने वालो उठो ख़्वाब-ए-ग़फ़लत मिटा लो मिटा लो कमर-बस्ता हो
स्वराज का झंडा भारत में गड़वा दिया गाँधी बाबा ने दिल क़ौम-ओ-वतन के दुश्मन का दहला दिया गाँधी
दिन को दिन रात को मैं रात न लिखने पाऊँ उनकी कोशिश है कि हालात न लिखने पाऊँ,
हर तरफ़ महकी हुई मेरे चमन की ख़ुशबू है फ़ज़ाओ में अज़ानों की भजन की ख़ुशबू, मुझ को
आओ मनाएँ हम सब मिल कर अब जश्न ए आज़ादी देस का झंडा ऊँचा रखे हाथ बनें फ़ौलादी,
अहिंसा की शमशीर चमकी इसी दिन ग़ुलामी की ज़ंजीर टूटी इसी दिन, गुलिस्ताँ की तक़दीर बदली इसी दिन
फ़र्द फ़र्द मस्त है, आज पंद्रह अगस्त है जोश है उबाल है, रंग है गुलाल है, गली गली
हिन्द का आज़ाद हो जाना कोई आसाँ नहीं देखना तुम को अभी क्या क्या दिखाया जाएगा, देखना तुम
भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ, मुर्दादिली का झंडा