वो इश्क़ जो हम से रूठ गया…
वो इश्क़ जो हम से रूठ गया अब उस का हाल बताएँ क्या ? कोई मेहर नहीं कोई
Occassional Poetry
वो इश्क़ जो हम से रूठ गया अब उस का हाल बताएँ क्या ? कोई मेहर नहीं कोई
एक हम दोनों को ये हालात नहीं कर सकते ख़ुद को वग्फ़ ए मुज़ाफ़ात नहीं कर सकते, तेरे
लहू ने क्या तेरे ख़ंजर को दिलकशी दी है कि हम ने ज़ख़्म भी खाए हैं दाद भी
ये जो ज़िंदगी की किताब है ये किताब भी क्या किताब है, कहीं एक हसीन सा ख़्वाब है
कहीं दिरहम कहीं डॉलर कहीं दीनार का झगड़ा कहीं लहँगा कहीं चोली कहीं शलवार का झगड़ा, वतन में
नाम से गाँधी के चिढ़ और बैर आज़ादी से है नफ़रतों की खाद हैं उल्फ़त मगर खादी से
कभी ख़ामोश बैठोगे, कभी कुछ गुनगुनाओगे मैं उतना ही याद आऊँगा मुझे जितना भुलाओगे, कोई जब पूछ बैठेगा
और क्या करता बयान ए गम तुम्हारे सामने मेरी आँखें हो गई पुरनम तुम्हारे सामने, हम जुदाई में
जब भी हँसी की गर्द में चेहरा छुपा लिया बे लौस दोस्ती का बड़ा ही मज़ा लिया, एक
बुरी है कीजिए नफ़रत निहायत मिटाए दिल से सदियों की अदावत चलो हम एक हो जाएँ, वो क्या