ज़मीं पे चल न सका आसमान से भी गया
ज़मीं पे चल न सका आसमान से भी गया कटा के पर को परिंदा उड़ान से भी गया,
Life Poetry
ज़मीं पे चल न सका आसमान से भी गया कटा के पर को परिंदा उड़ान से भी गया,
अब तो शहरों से ख़बर आती है दीवानों की कोई पहचान ही बाक़ी नहीं वीरानों की, अपनी पोशाक
तख़्लीक़ पे फ़ितरत की गुज़रता है गुमाँ और इस आदम ए ख़ाकी ने बनाया है जहाँ और, ये
हालत ए हाल के सबब हालत ए हाल ही गई शौक़ में कुछ नहीं गया शौक़ की ज़िंदगी
तुम आए हो न शब ए इंतिज़ार गुज़री है तलाश में है सहर बार बार गुज़री है, जुनूँ
कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी, कब
नया एक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम ? बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम ? ख़मोशी से
लोग कहते हैं ज़माने में मुहब्बत कम है ये अगर सच है तो इस में हकीक़त कम है,
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा, बेवक़्त अगर
कोई उम्मीद बर नहीं आती कोई सूरत नज़र नहीं आती, मौत का एक दिन मुअय्यन है नींद क्यूँ