कोशिश के बावजूद ये इल्ज़ाम रह गया

koshish ke bavjood ye

कोशिश के बावजूद ये इल्ज़ाम रह गया हर काम में हमेशा कोई काम रह गया, छोटी थी उम्र

शाम तक सुब्ह की नज़रों से उतर जाते हैं

sham tak subah ki

शाम तक सुब्ह की नज़रों से उतर जाते हैं इतने समझौतों पे जीते हैं कि मर जाते हैं,

ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है

zara saa qatara kahin

ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है समुंदरों ही के लहजे में बात करता है, खुली छतों

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे

apne chehre se jo

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे ? घर सजाने

क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता

kya dukh hai samundar

क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता आँसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता,

अपने हर हर लफ़्ज़ का ख़ुद आइना हो जाऊँगा

apne har har lafz

अपने हर हर लफ़्ज़ का ख़ुद आइना हो जाऊँगा उस को छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो

इन्सान हूँ इंसानियत की तलब है

insan hoon insaniyat ki

इन्सान हूँ इंसानियत की तलब हैकिसी खुदाई का तलबगार नहीं हूँ, ख़ुमारी ए दौलत ना शोहरत का नशाअबतक

देखा है ज़िंदगी को कुछ इतने क़रीब से

dekha hai zindagi ko

देखा है ज़िंदगी को कुछ इतने क़रीब से चेहरे तमाम लगने लगे हैं अजीब से, ऐ रूह-ए-अस्र जाग

तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम

tang aa chuke hai

तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम ठुकरा न दें जहाँ को कहीं बे-दिली से हम, मायूसी-ए-मआल-ए-मोहब्बत न

मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया

main zindagi ka saath

मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया, बर्बादियों का सोग