किसी से ख़ुश है किसी से ख़फ़ा ख़फ़ा सा है
किसी से ख़ुश है किसी से ख़फ़ा ख़फ़ा सा है वो शहर में अभी शायद नया नया सा
Life Poetry
किसी से ख़ुश है किसी से ख़फ़ा ख़फ़ा सा है वो शहर में अभी शायद नया नया सा
राक्षस था न ख़ुदा था पहले आदमी कितना बड़ा था पहले, आसमाँ खेत समुंदर सब लाल ख़ून काग़ज़
तेरा सच है तेरे अज़ाबों में झूठ लिखा है सब किताबों में, एक से मिल के सब से
कच्चे बख़िये की तरह रिश्ते उधड़ जाते हैं लोग मिलते हैं मगर मिल के बिछड़ जाते हैं, यूँ
कितनी तरकीबें कीं बातिन के लिए नून साकिन मीम साकिन के लिए, मेरे अपने मुझ से जब बरहम
क्या ग़म के साथ हम जिएँ और क्या ख़ुशी के साथ जो दिल को दे सुकून गुज़र हो
दिल ए बरहम की ख़ातिर मुद्दआ कुछ भी नहीं होता अजब हालत है अब शिकवा गिला कुछ भी
किसी भी शय पे आ जाने में कितनी देर लगती है मगर फिर दिल को समझाने में कितनी
है बहुत मूड में इस वक़्त दिल ए ज़ार चलो तुम मेरे साथ चलो और लगातार चलो, भाड़
जैसा हूँ स्वीकार तुम्हीं तो करती हो बिना शर्त के प्यार तुम्हीं तो करती हो, अपनी दिलकश अदा