सीनों में अगर होती कुछ प्यार की गुंजाइश
सीनों में अगर होती कुछ प्यार की गुंजाइश हाथों में निकलती क्यूँ तलवार की गुंजाइश, पिछड़े हुए गाँव
Life Poetry
सीनों में अगर होती कुछ प्यार की गुंजाइश हाथों में निकलती क्यूँ तलवार की गुंजाइश, पिछड़े हुए गाँव
यहाँ शोर बच्चे मचाते नहीं हैं परिंदे भी अब गीत गाते नहीं हैं, वफ़ा के फ़लक पर मोहब्बत
ख़ुद्दार मेरे शहर का फाक़ो से मर गया राशन जो आ रहा था वो अफ़सर के घर गया,
बिस्तर ए मर्ग पर ज़िंदगी की तलब जैसे ज़ुल्मत में हो रौशनी की तलब, कल तलक कमतरी जिन
हर आह ग़म ए दिल की ग़म्माज़ नहीं होती और वाह मसर्रत का आग़ाज़ नहीं होती, जो रोक
हम से दीवानों को असरी आगही डसती रही खोखली तहज़ीब की फ़र्ज़ानगी डसती रही, शोला ए नफ़रत तो
राहें धुआँ धुआँ हैं सफ़र गर्द गर्द है ये मंज़िल ए मुराद तो बस दर्द दर्द है, अपने
क्यूँ न फिर से दौर ए क़दीम में जाया जाए ? माँग कर आग घर का चूल्हा जलाया
बहुत ख़राब रहा इस दौर मे एक क़ौम का अच्छा होना, रास ना आया मनहूसों को क़ौम का
किसी झूठीं वफ़ा से दिल को बहलाना नहीं आता मुझे घर काग़ज़ी फूलों से महकाना नहीं आता, मैं